मैं कश्मीरी तो नहीं पर हिंदुस्तानी तो हूँ
मुक्कमल नहीं तो क्या, पर कहानी तो हूँ
वो लम्हे आज भी उन पर सिहरन सी लेकर आते हैं
आंखे नम हो जाती हैं और ज़ुबान लड़खड़ाते हैं
वो शरद ऋतु की रात थी बर्फ की चादर सरकी थी
कश्मीर हुआ था खाक, एक ऐसी आग भड़की थी
जले थे घर और बहा था खून, क़त्लेआम हुआ अधिकारों का
बेघर हुए कश्मीरी पंडित और कश्मीर हुआ मक्कारों का
ना सविंधान बचा न सरकारें जब घाटी हो गई गद्दारों की
आतंकवाद की जीत हुई और हार हुई हक़दारो की
Aditya Vikram Singh
एक कविता बिहार से
#kashmir #kashmiripandit
मुक्कमल नहीं तो क्या, पर कहानी तो हूँ
वो लम्हे आज भी उन पर सिहरन सी लेकर आते हैं
आंखे नम हो जाती हैं और ज़ुबान लड़खड़ाते हैं
वो शरद ऋतु की रात थी बर्फ की चादर सरकी थी
कश्मीर हुआ था खाक, एक ऐसी आग भड़की थी
जले थे घर और बहा था खून, क़त्लेआम हुआ अधिकारों का
बेघर हुए कश्मीरी पंडित और कश्मीर हुआ मक्कारों का
ना सविंधान बचा न सरकारें जब घाटी हो गई गद्दारों की
आतंकवाद की जीत हुई और हार हुई हक़दारो की
Aditya Vikram Singh
एक कविता बिहार से
#kashmir #kashmiripandit
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