Friday, 10 January 2020

गैऱ कश्मीरी की कलम से

मैं कश्मीरी तो नहीं पर हिंदुस्तानी तो हूँ
मुक्कमल नहीं तो क्या, पर कहानी तो हूँ

वो लम्हे आज भी उन पर सिहरन सी लेकर आते हैं
आंखे नम हो जाती हैं और ज़ुबान लड़खड़ाते हैं

वो शरद ऋतु की रात थी बर्फ की चादर सरकी थी
कश्मीर हुआ था खाक, एक ऐसी आग भड़की थी

जले थे घर और बहा था खून, क़त्लेआम हुआ अधिकारों का
 बेघर हुए कश्मीरी पंडित और कश्मीर हुआ मक्कारों का

ना सविंधान बचा न सरकारें जब घाटी हो गई गद्दारों की
  आतंकवाद की जीत हुई और हार हुई हक़दारो की

                                                   Aditya Vikram Singh
                                                    एक कविता बिहार से

#kashmir #kashmiripandit



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