वो मज़दूर था पर मज़बूर हो गया, रोज़गार उसका उससे दूर हो गया
सरहदें लांघी अमीरों ने और गरीबों का कसूर हो गया
मैंने देखा आज की वो पैदल चल पड़ा है
बनाये हज़ारों घर पर आज बेघर वो खड़ा है
वो आसमान छूती ईमारतें जहाँ तेरा आशियाँ है
उसे बनाने वाला मज़दूर न जाने वो कहाँ है
सब उसे नसीहतें दे रहे रोटियां कोई क्यों देता नहीं
सब रुकने को कह रहे पर पनाह कोई क्यों देता नहीं
वो मज़दूर था पर मज़बूर हो गया, रोज़गार उसका उससे दूर हो गया
सरहदें लांघी अमीरों ने और गरीबों का कसूर हो गया
Aditya Vikram Singh
एक कविता बिहार से
(Below was written hundreds of years ago but we see this being true everyday)
जिस तन लागे सोइ जाने , कोई न जाने पीर पराई
सरहदें लांघी अमीरों ने और गरीबों का कसूर हो गया
मैंने देखा आज की वो पैदल चल पड़ा है
बनाये हज़ारों घर पर आज बेघर वो खड़ा है
वो आसमान छूती ईमारतें जहाँ तेरा आशियाँ है
उसे बनाने वाला मज़दूर न जाने वो कहाँ है
सब उसे नसीहतें दे रहे रोटियां कोई क्यों देता नहीं
सब रुकने को कह रहे पर पनाह कोई क्यों देता नहीं
वो मज़दूर था पर मज़बूर हो गया, रोज़गार उसका उससे दूर हो गया
सरहदें लांघी अमीरों ने और गरीबों का कसूर हो गया
Aditya Vikram Singh
एक कविता बिहार से
(Below was written hundreds of years ago but we see this being true everyday)
जिस तन लागे सोइ जाने , कोई न जाने पीर पराई