Sunday, 29 March 2020

तमस

वो मज़दूर था पर मज़बूर हो गया, रोज़गार उसका उससे दूर हो गया
     सरहदें लांघी अमीरों ने और गरीबों का कसूर हो गया

               मैंने देखा आज की वो पैदल चल पड़ा है
            बनाये हज़ारों घर पर आज बेघर वो खड़ा है

           वो आसमान छूती ईमारतें जहाँ तेरा आशियाँ है
            उसे बनाने वाला मज़दूर न जाने वो कहाँ है         

         सब उसे नसीहतें दे रहे रोटियां कोई क्यों देता नहीं
       सब रुकने को कह रहे पर पनाह कोई क्यों देता नहीं

वो मज़दूर था पर मज़बूर हो गया, रोज़गार उसका उससे दूर हो गया
     सरहदें लांघी अमीरों ने और गरीबों का कसूर हो गया
                                         
                                                           Aditya Vikram Singh
                                                            एक कविता बिहार से

(Below was written hundreds of years ago but we see this being true everyday)
   
            जिस तन लागे सोइ जाने , कोई न जाने पीर पराई

Friday, 28 February 2020

सच्चे अल्फ़ाज़

          कुछ भ्रम मेरे भी टूटे हैं, कि रिश्ते ये कितने झूठे हैं
           चेहरों से ज्यादा मुखौटे हैं, सिक्के ये सारे खोटे हैं

        बड़ी घुटन है इन दीवारों में, बड़ा शोर है बेगानेपन का
       बड़ी खुदगर्ज़ी है हवाओं में, एक ज़र्रा नहीं अपनेपन का

     इमारतें हज़ार खड़ी हैं लेकिन एक घर का पता मालूम नहीं
   दीवार तो है और दरवाज़े भी पर एक पल का यहाँ सुकून नहीं

 मेरा इतना इम्तेहान न ले ऐ ज़िन्दगी, मै अकेला हूँ कोई हुज़ूम नहीं
 ये उधार की छत और ये कोसती दीवारें, मेरे हालात हैं तक़दीर नहीं

जो कल पनाह देने के वादे कर रहे थे वो आज बेघर करने के इरादे से आये हैं
 मुझे इंद्रधनुष का पता नहीं पर लोगो ने बड़े रंग बदल-बदल कर दिखाए हैं

               बहुत थक गया हूँ मैं, मुझे कुछ आराम दे दो
                  थोड़ा ठहराव दे दो या पूर्ण विराम दे दो
               सब टूट टूट बिखरा है, कुछ नए अरमान दे दो
                   थोड़ा ठहराव दे दो या पूर्ण विराम दे दो
               बड़ी उलझनों में हूँ, कोई तुम समाधान दे दो
                  थोड़ा ठहराव दे दो या पूर्ण विराम दे दो

          जीने देना बड़ा मुश्किल है तो मौत ही आसान दे दो 
             बहुत थक गया हूँ मैं, मुझे कुछ आराम दे दो
                थोड़ा ठहराव दे दो या पूर्ण विराम दे दो
                                                                       Aditya Vikram Singh 
                                                                        एक कविता बिहार से
                                                          

Thursday, 30 January 2020

रखवाले आज़ादी के


कुछ तो ज़रूर उन हवाओं में खास होगा जो गांव छोड़ सरहदों का रुख किया है
     कुछ तो सुकून मोहबते-वतन में भी होगा जो सब रिश्ते छोड़ आयें हैं पीछे
कुछ तो बड़ा कीमती मिलता होगा उन सीमाओं पर जो अपनी जान से भी ज्यादा अज़ीज होगा
    बस इसी को पाने वो भारत माता के वीर बड़ी जिंदादिली से मौत को हराने चले आते हैं

                                                                                         Aditya Vikram Singh



Friday, 10 January 2020

गैऱ कश्मीरी की कलम से

मैं कश्मीरी तो नहीं पर हिंदुस्तानी तो हूँ
मुक्कमल नहीं तो क्या, पर कहानी तो हूँ

वो लम्हे आज भी उन पर सिहरन सी लेकर आते हैं
आंखे नम हो जाती हैं और ज़ुबान लड़खड़ाते हैं

वो शरद ऋतु की रात थी बर्फ की चादर सरकी थी
कश्मीर हुआ था खाक, एक ऐसी आग भड़की थी

जले थे घर और बहा था खून, क़त्लेआम हुआ अधिकारों का
 बेघर हुए कश्मीरी पंडित और कश्मीर हुआ मक्कारों का

ना सविंधान बचा न सरकारें जब घाटी हो गई गद्दारों की
  आतंकवाद की जीत हुई और हार हुई हक़दारो की

                                                   Aditya Vikram Singh
                                                    एक कविता बिहार से

#kashmir #kashmiripandit



हाल ए हिंदुस्तान

अफवाहों का बाज़ार गरम है , तुम अपना नजरिया अपना  रखना
       हज़ार बातें कहेंगे तुमसे, बिना परखे यकीं न करना

   वो कहेंगे अपना धर्म बताओ, तुम हिंदुस्तानी पर अड़े रहना
वो कहेंगे कौम के साथ आओ , तुम सविंधान के साथ खड़े रहना

कोई केसरिया ले कर आएगा, कोई हरा रंग दिखाएगा
 तुम बिना किसी दो राय के तिरंगा लिए खड़े रहना

     तुम विरोध करो विद्रोह नहीं, लोकतंत्र का अधिकार है
क्यूंकि हुकूमत कोई और नहीं तुम्हारी अपनी चुनी सरकार है

तुम मुखर करो आवाज़ को, ज़रूरत नहीं होगी पत्थरबाजों को लाने की
तुम सच की आग लेकर आये हो तो ज़रूरत नहीं कुछ भी जलाने की

आवाज़ों को सुना भी जाएगा और अपराधिओं को कुचला भी जाएगा
     तुम किस ओर हो ये फैसला सिर्फ सच के वजूद पर करना

अफवाहों का बाज़ार गरम है , तुम अपना नजरिया अपना  रखना
       हज़ार बातें कहेंगे तुमसे, बिना परखे यकीं न करना

                                                          Aditya Vikram Singh
                                                           एक कविता बिहार से